अनकही बातें

कुछ बातें मु पर अटकी हुई है

कुछ बातें अनकही सी

बोलूं या ना बोलूं

शायद ये कश्मकश ही ज्यादा मज़ा है

बोलती हूं फिर कभी जब लंबी सी फुरसत मिले

या फिर बस उसको यादों में ही बसा लूं

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